कांग्रेस की विचारधारा- जैसी कि उसके संस्थापकों ने कल्पना की थी- लोकतंत्र, मानवाधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सर्वधर्म-समभाव की थी, जब पार्टी सत्ता में रही,
तब इन आदर्शों का जब-तब उल्लंघन जरूर किया जाता रहा- आपातकाल इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है- लेकिन उसका व्यापक दृष्टिकोण अभी भी कायम है, हालांकि 1984 के लोकसभा चुनावों के बाद से- जब उसे 48.1 प्रतिशत वोट मिले थे- कांग्रेस कभी भी अपने दम पर सत्ता नहीं हासिल कर पाई है!
उसका वोट-प्रतिशत 2014 के बाद से औसतन लगभग 20 प्रतिशत रहा है, जबकि 1977 की पराजय में भी पार्टी को 34.5 प्रतिशत वोट मिले थे! इससे भी बुरी बात यह है कि पार्टी में पुनरुत्थान के कोई संकेत नहीं नजर आ रहे, जमीनी स्तर से लेकर ऊपर तक पार्टी का समूचा पुनर्गठन ही इसका इकलौता समाधान है!
चिंतन शिविर या अन्य सतही बदलावों से कोई फायदा नहीं होने वाला है, जब शरीर वेंटिलेटर पर हो तो बैंड-एड कारगर नहीं होता, बल्कि पूरी सर्जरी करनी पडती है!मूल समस्या यह है कि कांग्रेस संगठनात्मक रूप से निष्क्रिय हो गई है,उसके जमीनी ढांचे और कैडर की ताकत ढह गई है।
इसलिए, कांग्रेस तो आज भी खड़ी है, लेकिन बिना नींव के,ऐसी स्थिति में पार्टियां केवल बयानबाजी के स्तर पर ही काम कर सकती हैं!
कांग्रेस की मूल समस्या है संगठनात्मक रूप से निष्क्रिय होना!
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